रात के लगभग 2 बजे थे। ठंडी हवा चल रही थी और हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी।
मैं सतेन्द्र अपने दोस्तों के साथ कानपुर के एक पुराने से तीन मंज़िला होटल में रुका हुआ था। हम लोग एक जरूरी काम से आए थे, लेकिन असल वजह एक लड़की थी जिससे मेरी ऑनलाइन दोस्ती हुई थी। उसका नाम प्रियंका (काल्पनिक नाम) था।
दिन भर हम लोगों ने काफी मस्ती की, थोड़ा नशा भी हो गया था।
होटल में कमरे ऐसे थे — ग्राउंड फ्लोर पर मेरे कुछ दोस्त जिनमें पुनीत भी था, बीच वाली मंज़िल पर मैं और सबसे ऊपर प्रियंका (काल्पनिक नाम) रुकी थी तीसरी मंज़िल पर जिसके ऊपर टेरेस (छत) बना था।
लेकिन रात को सोने से पहले सबने मुझे एक बात बार-बार कही — “भाई… ऊपर टेरेस पर मत जाना। वहां जाना कुछ ठीक नहीं है।”
मैंने पूछा भी — “क्यों?” पर किसी ने सही जवाब नहीं दिया… बस बोले — “मत जाना।”
रात में अचानक मैं जाग गया, मुझे एक आवाज सुनाई दी — “मैं ऊपर छत पर हूँ… मिलोगे?”
नशे में दिमाग ज़्यादा सोच नहीं पाया। मैं धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चला गया। छत पर पहुंचा तो ठंडी हवा और बूंदाबांदी के बीच वह खड़ी थी प्रियंका।
हम थोड़ी देर बातें करते रहे… उसकी आंखें अजीब थीं, जैसे अंधेरे में चमक रही हों।
कुछ देर बाद मैं नीचे अपने कमरे में जाने लगा।
लेकिन…
अजीब बात हुई।
मैं सीढ़ियां उतरता…
और फिर से उसी छत पर पहुंच जाता।
फिर नीचे जाता…
फिर वही तीसरी मंज़िल।
ऐसा लगा जैसे पूरा होटल भूलभुलैया बन गया हो।
मेरा दिल घबराने लगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई —
“अरे सतेन्द्र भाई… आप यहाँ क्या कर रहे हो?”
मैंने मुड़कर देखा —
मेरा दोस्त पुनीत खड़ा था।
उसनें मुझे संभाला, मेरा हाथ पकड़ा और बोला—
“अरे सतेन्द्र भाई आप इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो, चलो… मैं तुम्हारे कमरे तक छोड़ देता हूं। ऊपर टेरेस पर रहना ठीक नहीं।”
मैंने राहत की सांस ली। हम दोनों सीढ़ियां उतरते हुए मेरे कमरे की तरफ जाने लगे लेकिन जैसे-जैसे मेरा नशा उतरने लगा, मुझे कुछ अजीब महसूस होने लगा। हवा बहुत तेज़ हो गई थी। आंखें साफ हुईं तो मैं एकदम सन्न रह गया। हम कमरे में नहीं थे…
हम तो सबसे ऊपर वाली छत पर बाउंड्री से नीचे पैर लटकाये बैठे थे जैसे कोई डर ही न हो।
मैंने घबराकर बगल में देखा… वह पुनीत भाई नहीं थे। वह… प्रियंका थी।
उसका चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा था…उसनें सफ़ेद कपडे पहन रखे थे… लंबे काले बाल हवा में उड़ रहे थे… आंखें पूरी लाल हो गई थीं।
वह मेरी तरफ धीमे से हंसी और बोली — “तुम्हें याद है सतेन्द्र… सबने कहा था ना… टेरेस (छत) पर मत जाना…”
मेरे हाथ-पैर सुन्न हो गए।
वह आगे झुककर मेरे कान में फुसफुसाई — “मैं ही तुम्हें कानपुर बुलाकर लाई थी… ताकि आज के बाद… तुम मेरे साथ यहीं रह जाओ…”
प्रियंका की हंसी अचानक भयानक चीख में बदल गई।
और उसी पल…
मुझे लगा किसी ने मुझे पीछे से जोर से धक्का दे दिया।
सुबह जब मेरे दोस्त उठे… तो होटल के चौकीदार ने बताया — “रात में कुछ छत से गिरने की आवाज़ आई थी…”
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी — उस कानपुर होटल में किसी “प्रियंका” नाम की लड़की ने कभी कमरा लिया ही नहीं था… 😶🌫️👣

लेखक – सतेन्द्र बदायूँनी
जिला- बदायूँ (उ० प्र०)
मोबाइल- 9528223809







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