कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, वे इंसानों की आँखों में छिपी रहती हैं। उनके चेहरे की मुस्कान के पीछे, उनकी चुप्पियों के भीतर, उनके अधूरे सपनों के बीच। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मैं सतेन्द्र बदायूँनी, पेशे से एक कहानीकार हूँ। वर्षों से समाज के बीच रहते हुए मैंने अनेकों बार लोगों के संघर्ष, उनके रिश्ते, उनकी टूटती उम्मीदें और उनके भीतर के अनकहे दर्द को अपनी कलम से शब्दों में उतारता आया हूँ। साथियों लेकिन यह कहानी मेरी बाकी कहानियों से अलग है, क्योंकि यह कहानी किसी काल्पनिक पात्र की नहीं बल्कि मेरे ही अपने दोस्त विवेक की कहानी है। विवेक एक ऐसा लड़का, जिसे बाहर से देखने वाले लोग बेहद सफल, समझदार, सलीकेदार और आत्मविश्वासी मानते थे, लेकिन उसके भीतर कितनी टूटन और तकलीफे थी, यह शायद ही कोई जान पाता। यह कहानी मेरे उसी दोस्त विवेक की है, जो दूसरों की खुशियों को कैमरे में कैद करते-करते अपनी ही जिंदगी की सबसे खूबसूरत तस्वीरों को धुंधला होते हुए देखता रह गया।
रात के लगभग दो बजे थे। शादी का माहौल अपने पूरे जोश और शोर में डूबा हुआ था। डीजे अभी-अभी बंद हुआ था। चारों ओर जगमगाती रंग-बिरंगी लाइटें, जमीन पर टूटे पड़े गुलाब के फूल, खाने की कतार से आ रही लाजवाब खुशबू किसी के भी मुँह में पानी ला दे, लोगों के चहरे का मुस्कान, सुन्दर और मूल्यवान वस्त्र पहने महिलाये, मुस्कुराते हुये चेहरे के साथ अलग-अलग पोज में दुल्हे के साथ सेल्फी लेती लडकियाँ और बारात में बच्चों का शोर और भागदौड़ मिलकर उस शादी कार्यक्रम की रौनक में चार चाँद लगा रहे थे। उसी भीड़ और शोर के बीच, डांस वाले डीजे साउंड-सिस्टम के पास पड़ी लाल रंग की पुरानी टेंट वाली प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था मेरा दोस्त विवेक। उसके कंधे पर शादी की विडियो बनाने वाला कैमरा था, पीठ पर बड़े आकार का भारी बैग टँगा था और आँखों में थकान की गहरी लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं। पूरे दिन की भागदौड़ के बाद उसे बैठे हुए मुश्किल से पाँच मिनट भी न हुए होंगे कि तभी पीछे से किसी की तेज आवाज आई। एक रिश्तेदार ने ऊँची आवाज में कहा कि ये फोटोग्राफर यहाँ क्यों बैठा है, जल्दी उठ और मेरी फोटो खींच, और हाँ देख लेना अगर मेरी फोटो अच्छी नहीं आयी तो एक पैसा भी नहीं मिलेगा। ये सब सुनकर एक-बार को विवेक के दिल पर भारी चोट तो लगी लेकिन उतने लोगों के बीच कुछ भी कह न सका उसका आत्मसम्मान दाँव पर लगा था विवेक सोचने लगा की आखिर ऐसे कौन बात करता है किसी से। तभी फोटोग्राफ़र विवेक कुर्सी से उठा, कैमरा संभाला और शांत स्वर में चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ बोला- जी आइए, मैं आपकी फोटो खींच देता हूँ। सामने खड़े लोग हँस रहे थे, मजाक कर रहे थे, प्लेटों में खाना भरा था, लेकिन विवेक ने सुबह से कुछ नही खाया था। किसी ने उससे यह तक नहीं पूछा था कि साथ में सुबह से काम कर रहे हो खाना-खाया भी या नहीं। विवेक पिछले तीन दिनों से बिना सोये लगातार शादियों में विडियो बनाने का काम कर रहा था। एक कार्यक्रम खत्म होता तो दूसरा शुरू हो जाता उसका रोज का जीवन कुछ ऐसा ही चल रहा था जिसका उस पर कोई नियंत्रण नही था। लेकिन उसे कैमरा उठाने से ज्यादा थकान नहीं होती, बल्कि लोगों के व्यवहार से होती थी। हर कोई उसे सिर्फ “फोटोग्राफर” कहकर बुलाता था, जैसे उसका कोई नाम ही न हो।
विवेक कोई साधारण लड़का नहीं था। वह पढ़ा-लिखा, समझदार और बेहद सज्जन स्वभाव का युवा था। उसने पढाई में ग्रेजुएशन कर रखी थी और कई वर्षों तक सरकारी नौकरी की तैयारी की थी। लेकिन कोरोना महामारी के बाद साल-दर-साल वर्ष 2026 का समय बेरोजगारी, सीमित नौकरियों, टूटती उम्मीदों और अधूरे सपनों का समय था। भारत देश में लाखों पढ़े-लिखे युवाओं की तरह विवेक भी उसी भीड़ का हिस्सा बन चुका था, जो आपनी-अपनी डिग्रियाँ हाथ में लिए नौकरी की कतारों में एक उम्मीद की किरण का हर दिन इंतजार कर रहे थे। विवेक की पारिवारिक स्थति अधिक ठीक नही थी उसके ऊपर परिवार की सारी जिम्मेदारियाँ थी और छोटे भाई-बहनों की पढाई और टियुसन फीस का खर्च भी उसे ही स्वमं उठान था। उसे कोई और काम न मिलने पर वह फोटोग्राफ़र के रूप की डिज़िटल फोटो स्टूडियो की दुकान पर नौकरी पर लग गया। इस नौकरी को करते हुए धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि इस समाज में शिक्षा और मेहनत से ज्यादा पैसे की कीमत है और आजकल लोग सिर्फ पैसा देखकर ही एक-दुसरे को इज्जत देते हैं। आपके जेब में पैसे और सैलरी ही तय करती है कि ये समाज आपको कितनी इज्जत देगा। परिवार की उम्मीदें, रिश्तेदारों के ताने और समाज की बनाई हुई सफलता की परिभाषा ने उसे भीतर से थका और हारा हुआ साबित कर दिया था। अंततः वह भी समाज में थोडा आत्मसम्मान बचाने के लिए कैमरामैन बन ही गया और शादी, जागरण, जन्मदिन तथा छोटे-बड़े कार्यक्रमों में फोटो और वीडियो बनाने का काम करने लगा। महीने के तकरीबन बारह हजार रुपये जरूर मिल जाते थे लेकिन कभी-कभी ज्यादा काम न होने पर यही रूपए दो या तीन महीने रुककर भी मिल पते थे। विवेक समाज की नजर में सिर्फ एक मामूली सा फोटोग्राफर था, कोई सफल इंसान नहीं। विवेक के लिए फोटोग्राफ़र का काम और गले में निकोन कम्पनी का कैमरा ही उसकी रोजीरोटी था उससे ही उसके परिवार का सारा खर्च चलता था। समाज की नजरों में उसका फोटोग्राफ़र वाला काम सिर्फ एक काम मात्र था लेकिन उसके और उसके परिवार के लिए जीवन जीने की एक आखिरी उम्मीद था।

विवेक की जिंदगी में अगर कोई सच्ची खुशी थी, तो वह थी नेहा। नेहा पढ़ी-लिखी, समझदार, खूबसूरत और बेहद सामाजिक लड़की थी। दोनों बीते चार वर्षों से एक-दूसरे से प्रेम करते थे। वे अपने इस प्रेम के रिश्ते को सम्मानपूर्वक दोनों परिवारों की रजामंदी के साथ शादी में बदलना चाहते थे, लेकिन उसके भी जीवन में सबसे बड़ी वही समस्या सामने खड़ी थी, जोकि आज के समय में सैकड़ों प्रेम कहानियों की होती है — लड़के की सरकारी नौकरी। नेहा के परिवार वालों से विवेक पिछले चार सालों में अनेकों बार मिल चुका था, नेहा के माता-पिता को भी विवेक अच्छा लगता था, लेकिन उनके अनुसार वह सफल नहीं था। कारण सिर्फ इतना था कि उसके पास सरकारी नौकरी नहीं थी। समाज में सफलता का मतलब इंसान का चरित्र या संघर्ष नहीं, बल्कि सिर्फ उसकी नौकरी और वेतन बन चुका था और उससे ही उसे आँका जाता था। विवेक और नेहा ने कभी परिवार के खिलाफ जाकर कोई कदम नहीं उठाया और न ऐसा कुछ करने का विचार के अपने दिलों में लाते थे। दोनों चाहते थे कि उनके माता-पिता और परिवार की इज्जत पूरी तरह समाज में बनी रहे। धीरे-धीरे चार साल गुजर गए और पाँचवा साल शुरू हो गया लेकिन उनके रिश्ते में आज भी वहीं सरकारी नौकरी का ब्रेक लगा रहा।
कुछ दिन पहले विवेक और नेहा शहर के एक मेले में मिले थे। मेले में रंग-बिरंगी सजी हुई तरह-तरह की दुकानें थीं। कहीं से चाट-मसाले की खुशबू आ रही थी कहीं बच्चों वाले खिलौनों की आवाज तो कहीं बड़े चरखे झूलों का शोर। उसी बीच मेले की एक गली में घूमते हुए नेहा के पैर अचानक एक कॉस्मेटिक की दुकान के सामने रुक गये। वहाँ दुकान पर शीशे की अलमारी में सजा एक चमकदार नंगों वाला कँगन सेट उसकी आँखों में बस गया। वह कँगन एकदम सोने की तरह चमक रहे थे और उन पर जड़े सफ़ेद चमकीले नग किसी बेशकीमती हीरों की तरह लग रहे थे। इतना सुन्दर कँगन सेट नेहा ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा था वह पहले थोडा हिचकिचाई की न जाने ये कँगन कितने महँगे होंगे कहीं ये हजार-दो हजार के तो नहीं। नेहा के मन में वह चमकीले नगों वाले कँगन इस प्रकार बस गये थे कि न चाहते हुए भी नेहा खुद को रोक नहीं पायी और उसने मुस्कुराते हुए अपनी अँगुली से कँगनों की ओर इशारा करते हुए विवेक से कहा कि देखो ना विवेक, वह कँगन कितने सुंदर है न। विवेक ने कँगनो की ओर देखा दोनों कँगन सीसे की अलमारी में सोने की तरह चमक रहे थे। वहीं नेहा की आँखों की उन कँगनो को पाने उम्मीद और चमक साफ़-साफ़ दिखायी दे रही थी की विवेक उसके लिए वो कँगन जरूर खरीद के दिलवा देगा। विवेक ने तुरंत दुकानदार से पूछा कि दुकानदार भैया वह कँगन सेट कितने का है। दुकानदार अपने मुँह में मीठा पान चवा रहा था उसने तिरस्कार भरी नजरों से विवेक को देखा और चिल्लाते हुए जवाब दिया कि ऊपर टँगे बोर्ड पर साफ़-साफ लिखा है “एक दाम की दुकान, हर माल 150 रुपये।” न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते हैं दिमाग ख़राब करने हटो दूकान के सामने से। वह कँगन सेट 150 रूपए का था। विवेक ने जेब टटोली। उसके पास 50 रुपये का एक नोट, 20 रुपये का एक नोट और कुछ सिक्के थे। विवेक ने सभी को निकालकर गिना तो कुल मिलाकर सिर्फ 78 रुपये निकले। उसने धीरे से दुकानदार से कहा कि भैया अभी मेरे पास केवल 78 रुपये हैं, बाकी मैं अगले दिन दे दूँगा। दुकानदार ने कठोर स्वर में कहा जाओ यहाँ से तुम्हारे जैसे दो चार लोग रोज आते हैं और उधार सामान लेकर गायब हो जाते हैं फिर दुबारा भी वो दिखते नहीं। नेहा से विवेक यह अपमान सहा नहीं गया। उसने दुकानदार को जवाब दिया कि अगर ग्राहक से बात करने की तमीज नहीं है तो क्यों दुकान खोल कर बैठ जाते हो चलो विवेक हम ऐसे ही कँगन किसी दूसरी दुकान से खरीद लेंगे। इसके बाद दोनों वहाँ से चल दिये। उन्होंने पूरे मेले की सभी दुकानों पर वैसे कँगन ढूँढे, लेकिन उस डिजाइन का उसके जैसा कहीं न मिला। उस दिन विवेक ने अपने मन में ठान लिया था कि वह नेहा के लिए वही कँगन जरूर खरीद के देगा।
अब वर्तमान में, शादी वाले पंडाल में बैठा विवेक अपनी जेब में रखे 100 रुपये के नोट को निकालकर बार-बार देख रहा था। उस नोट को देखते ही उसे नेहा की मुस्कान याद आ जाती। उसे वह दिन भी याद आता जब नेहा ने उसके कंधे पर सिर रखकर कहा था कि उसे कोई बेसकीमती कँगन नहीं, उसे सिर्फ विवेक चाहिए और विवेक का साथ। लेकिन विवेक जानता था कि प्रेम में कभी-कभी छोटे-छोटे तोहफे भी बहुत मायने रखते हैं। अभी विवेक के पास 100 रुपये थे और उसे 150 रुपये चाहिए थे जिससे वह नेहा को कँगनो वाला सेट खरीद के तोहफे में दे सके। मेरे पास 50 रुपये कम हैं काश 50 रूपए और होते, कहाँ से लाऊ, कहाँ से जुटाऊ पैसे। वह कुर्सी पर बैठे यही सोच रहा था। इतना खो गया था कि जैसे उसकी भूख, प्यास और थकान सब गायब हो गई हो।
सारी रात जागते हुए वीडियोग्राफी का काम करते-करते सुबह होने वाली थी। दूल्हा-दुल्हन के मंडप के नीचे फेरे शुरू हो चुके थे। पंडित जी संस्कृत में वेद-मंत्र पढ़ रहे थे। अग्नि जल रही थी उसमे घी व हवन सामग्री डाली गयी। दूल्हे ने सात वचन और दुल्हन ने 3 वचन स्वीकार किये। विवेक कैमरा हाथ में लिए विवाह समारोह का हर दृश्य रिकॉर्ड कर रहा था, अचानक विवेक को मंडप पर बैठी दुल्हन में नेहा दिखाई देने लगती। दुल्हन की हरी चूड़ियाँ, उसके हाथों के कँगन, उसकी माँग का सिंदूर अब मानों हर चीज में उसे नेहा नजर आने लगी। कुछ पलों के लिए वह भूल जाता कि वह एक फोटोग्राफर है। उसे लगता जैसे वह खुद मंडप में बैठा हो और सामने नेहा हो। और अचानक उसे होश आता तो फिर से कैमरा संभाल लेता और विडियो फोटो लेने लगता। लेकिन उसका दिल अब भी उन्हीं ख्वाबों में बार-बार भटक रहा था। धीरे-धीरे विदाई का समय आ गया। दुल्हन के साथ-साथ वहाँ उपस्थित सभी रिश्तेदारों की ऑंखें नम थी। दुल्हन की माँ उसे गले लगाकर रो रही थी। भाई भी एक तरफ खड़ा अपने आँसू छिपा रहा था। लेकिन विवेक की आँखों में आँसू नहीं थे। क्योंकि वह इतनी विदाइयाँ देख चुका था कि अब उसके आँसू सूख चुके थे।
तभी विदाई हो रही दुल्हन वाली गाड़ी के ऊपर पैसे उड़ने लगे। दस-दस के नोट, सिक्के, बच्चों की भीड़ में बच्चे रूपए लूट रहे थे। गाँव के सभी बच्चे खुशी से दौड़- दौड़ कर हवा में उड़ते नोट पकड़ रहे थे। विवेक दूर खड़ा विडियो बनाता यह सब देख रहा था। तभी उसके मन में एक ख्याल आया कि काश उसे भी पचास रुपये मिल जाएँ। उसका आत्मसम्मान उसे रोक रहा था, लेकिन मजबूरी उससे बड़ी हो चुकी थी। अचानक रुपये दुबारा लुटाये गये उसने कैमरा एक हाथ में पकड़ा और दूसरे हाथ से हवा में ही उड़ते कई नोट जल्दी-जल्दी पकड़ लिए। वह जल्दी से साइड में गया और नोट गिने। विवेक बहुत खुश था की उसने उतने रूपए तो लूट ही लिए है जिनसे वह मेला जाकर वो कँगन खरीद सकेगा लेकिन उसकी ये ख़ुशी ज्यादा देर तक नही चल सकी। चार नोट थे दस-दस के — कुल चालीस रुपये। वह फिर से निराश सा हो गया। अब उसके पास 140 रुपये हो चुके थे। बस 10 रुपये कम थे जोकि सब मिलाकर 150 रूपए हो जाते और विवेक तुरंत मेले में जाकर नेहा के लिए उसके पसंदीदा सोने जैसे चमकने वाले कँगन लाकर दे देता। मात्र 10 रुपये कम थे जोकि उस समय उसे 10 हजार जैसे लग रहे थे। विवेक सोच रहा था की काश उसे बस एक और नोट मिल गया होता।
कुछ देर बाद सिक्के उड़ाए गए। इस बार विवेक खुद बच्चों की लाइन में खड़ा था। नोटों का तो तब भी ठीक था लेकिन इस बार कार के पीछे बच्चों वाली लाइन में खुद को खड़ा देख विवेक बहुत असहज महसूस कर रहा था। पाँच फुट दस इंच का पढ़ा-लिखा युवक, साफ़ सुन्दर कपडे पहने हुए, छोटे बच्चों के बीच सिर्फ दस रुपये के लिए खड़ा था। आज उसने अपने प्रेम के लिये अपना सारा आत्मसम्मान दाव पर लगा दिया था। कार के पीछे बच्चो की कतार में साथ खड़ा विवेक उम्र में भी सबसे बड़ा था और हाइट में भी। सिक्के हवा में उछले और विवेक ने जमीन पर गिरे जल्दी-जल्दी कुछ सिक्के उठा लिए। वह तुरंत भीड़ से हटकर एक तरफ गया और सिक्के गिनने लगा। कुल ग्यारह रुपये के सिक्के थे। उसने लम्बी गहरी साँस ली अब उसके पास 151 रुपये हो चुके थे। उसका चेहरा खुशी से चमक उठा था। अपने हाथों में आज एकसाथ 151 उसे लगा जैसे उसने जिंदगी की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली हो।
शादी खत्म होते ही विवेक सीधे उसी दुकान पर पहुँचा। कँगन का सेट अभी भी वहीं रखा था। उसे देखकर विवेक के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने बड़े विनम्र स्वर में दुकानदार से कहा कि भैया, वह वाला कँगन सेट दे दीजिए। विवेक ने सारे पैसे दुकानदार के सामने रख दिए। दुकानदार ने सारे पैसे गिने कुल 151 रूपए थे, फिर अचानक एक सिक्का उठाकर बोला कि यह दो रुपये का सिक्का नहीं चलेगा। विवेक घबरा गया और उसने पूछा कि क्यों। दुकानदार ने जवाब दिया कि यह पुराना बंद हो चुका सिक्का है, अब इसकी कोई कीमत नहीं। यह 2 रूपए का सिक्का खोटा है चाहे पूरे मेले में दिखा दो कोई दुकानदार इसे रख ले तो कहना। इतना सुनते ही विवेक के पैरों तले जमीन खिसक गई। क्योंकि उसके पास अब सिर्फ 149 रुपये थे लेकिन 1 रुपया कम। विवेक ने बहुत ही विनम्रता से हाथ जोड़कर दुकानदार से कहा कि भैया मुझे वह कँगन सेट लेना बहुत जरूरी है सिर्फ 1 रुपया ही तो कम है, 1 रूपया कम में कँगन सेट दे दीजिये या आप 1 रुपया उधार कर ले, चाहे तो कल ले लेना, लेकिन भैया आज यह कँगन मुझे दे दीजिए। खडूस दुकानदार ने कठोर आवाज में जवाब दिया कि एक रुपया कम है तो कम है, बिना पूरे पैसे के सामान नहीं मिलेगा। विवेक ने एक-बार फिर विनती की, लेकिन दुकानदार तब भी नहीं माना। आखिरकार विवेक चुप हो गया। उसने आखिरी बार उस सोने के रंग के, कँगन सेट को देखा जिस पर हीरे की तरह जड़े हुये सफ़ेद नग अब भी चमक रहे थे। विवेक ने नेहा की चेहरे की मुस्कान को याद किया और निराश होते हुए बिना कँगन के फिर से लौट आया।
उस दिन बाजार की भीड़ में चलते हुए विवेक पहली बार खुद को इतना टूटा हुआ और कमजोर महसूस कर रहा था। जोकि इसलिए नहीं कि उसके पास पैसे कम थे। वह इसलिए निराश था क्योंकि उसने अपनी पूरी रात, अपनी पूरी मेहनत, अपना आत्मसम्मान और अपनी सारी थकान सिर्फ 150 रुपये के लिए दाँव पर लगा दी थी। वह बच्चों के बीच दुल्हन वाली कार के पीछे खड़े होकर सिक्के लूट कर आया था। अपनी आत्मा तक को झुका आया था, फिर भी वह अपनी प्रेमिका की छोटी सी ख्वाहिश पूरी नहीं कर सका। उसके हाथ खाली थे, लेकिन दिल बहुत भारी। उस दिन विवेक और अच्छे से समझ गया था कि इस समाज में प्रेम से ज्यादा कीमत पैसे की है, नौकरी की है। व्यक्ति के स्वाभाव और विचारों से ज्यादा अहमियत उसके पर्स में रखे पैसों की होती है। और सफलता का आंकलन सरकारी नौकरी से होता है। उस दिन विवेक सिर्फ 1 रुपया नहीं हारा था बल्कि वह समाज की बनायी हुई सफलता की परिभाषा से हार गया था।
वह तस्वीरें तो सबकी सँवारता रहा उम्रभर,
पर अपनी मोहब्बत की तस्वीर धुंधली रह गई…
बस एक रुपया कम था, डेढ़ सौ में,
नेहा के कँगनों की ख्वाहिश अधूरी रह गई…

लेखक – सतेन्द्र बदायूँनी
जिला- बदायूँ (उ० प्र०)
मोबाइल- 9528223809



















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